1
ये लोग आपस में किस चीज़ का हाल पूछते हैं
3
जिसमें लोग एख्तेलाफ कर रहे हैं
4
देखो उन्हें अनक़रीब ही मालूम हो जाएगा
5
फिर इन्हें अनक़रीब ही ज़रूर मालूम हो जाएगा
6
क्या हमने ज़मीन को बिछौना
7
और पहाड़ों को (ज़मीन) की मेख़े नहीं बनाया
8
और हमने तुम लोगों को जोड़ा जोड़ा पैदा किया
9
और तुम्हारी नींद को आराम (का बाइस) क़रार दिया
11
और हम ही ने दिन को (कसब) मआश (का वक्त) बनाया
12
और तुम्हारे ऊपर सात मज़बूत (आसमान) बनाए
13
और हम ही ने (सूरज) को रौशन चिराग़ बनाया
14
और हम ही ने बादलों से मूसलाधार पानी बरसाया
15
ताकि उसके ज़रिए से दाने और सबज़ी
16
और घने घने बाग़ पैदा करें
17
बेशक फैसले का दिन मुक़र्रर है
18
जिस दिन सूर फूँका जाएगा और तुम लोग गिरोह गिरोह हाज़िर होगे
19
और आसमान खोल दिए जाएँगे
20
तो (उसमें) दरवाज़े हो जाएँगे और पहाड़ (अपनी जगह से) चलाए जाएँगे तो रेत होकर रह जाएँगे
21
बेशक जहन्नुम घात में है
22
सरकशों का (वही) ठिकाना है
23
उसमें मुद्दतों पड़े झींकते रहेंगें
24
न वहाँ ठन्डक का मज़ा चखेंगे और न खौलते हुए पानी
25
और बहती हुई पीप के सिवा कुछ पीने को मिलेगा
26
(ये उनकी कारस्तानियों का) पूरा पूरा बदला है
27
बेशक ये लोग आख़ेरत के हिसाब की उम्मीद ही न रखते थे
28
और इन लोगो हमारी आयतों को बुरी तरह झुठलाया
29
और हमने हर चीज़ को लिख कर मनज़बत कर रखा है
30
तो अब तुम मज़ा चखो हमतो तुम पर अज़ाब ही बढ़ाते जाएँगे
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