1
ऐ (मेरे) कपड़ा ओढ़ने वाले (रसूल) उठो
2
और लोगों को (अज़ाब से) डराओ
3
और अपने परवरदिगार की बड़ाई करो
6
और इसी तरह एहसान न करो कि ज्यादा के ख़ास्तगार बनो
7
और अपने परवरदिगार के लिए सब्र करो
9
तो वह दिन काफ़िरों पर सख्त दिन होगा
11
(ऐ रसूल) मुझे और उस शख़्श को छोड़ दो जिसे मैने अकेला पैदा किया
12
और उसे बहुत सा माल दिया
13
और नज़र के सामने रहने वाले बेटे (दिए)
14
और उसे हर तरह के सामान से वुसअत दी
15
फिर उस पर भी वह तमाअ रखता है कि मैं और बढ़ाऊँ
16
ये हरगिज़ न होगा ये तो मेरी आयतों का दुश्मन था
17
तो मैं अनक़रीब उस सख्त अज़ाब में मुब्तिला करूँगा
18
उसने फिक्र की और ये तजवीज़ की
19
तो ये (कम्बख्त) मार डाला जाए
20
उसने क्यों कर तजवीज़ की
22
फिर त्योरी चढ़ाई और मुँह बना लिया
23
फिर पीठ फेर कर चला गया और अकड़ बैठा
24
फिर कहने लगा ये बस जादू है जो (अगलों से) चला आता है
25
ये तो बस आदमी का कलाम है
26
(ख़ुदा का नहीं) मैं उसे अनक़रीब जहन्नुम में झोंक दूँगा
27
और तुम क्या जानों कि जहन्नुम क्या है
28
वह न बाक़ी रखेगी न छोड़ देगी
29
और बदन को जला कर सियाह कर देगी
30
उस पर उन्नीस (फ़रिश्ते मुअय्यन) हैं
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