Ana SayfaMealler › Suhel-Saifur
SS

Suhel-Saifur

Suhel-Saifur
Suhel-Saifur meali ile okumaya başla
Kalem 1 / 52
1
नून क़लम की और उस चीज़ की जो लिखती हैं (उसकी) क़सम है
Suhel-Saifur 68:1
2
कि तुम अपने परवरदिगार के फ़ज़ल (व करम) से दीवाने नहीं हो
Suhel-Saifur 68:2
3
और तुम्हारे वास्ते यक़ीनन वह अज्र है जो कभी ख़त्म ही न होगा
Suhel-Saifur 68:3
4
और बेशक तुम्हारे एख़लाक़ बड़े आला दर्जे के हैं
Suhel-Saifur 68:4
5
तो अनक़रीब ही तुम भी देखोगे और ये कुफ्फ़ार भी देख लेंगे
Suhel-Saifur 68:5
6
कि तुममें दीवाना कौन है
Suhel-Saifur 68:6
7
बेशक तुम्हारा परवरदिगार इनसे ख़ूब वाक़िफ़ है जो उसकी राह से भटके हुए हैं और वही हिदायत याफ्ता लोगों को भी ख़ूब जानता है
Suhel-Saifur 68:7
8
तो तुम झुठलाने वालों का कहना न मानना
Suhel-Saifur 68:8
9
वह लोग ये चाहते हैं कि अगर तुम नरमी एख्तेयार करो तो वह भी नरम हो जाएँ
Suhel-Saifur 68:9
10
और तुम (कहीं) ऐसे के कहने में न आना जो बहुत क़समें खाता ज़लील औक़ात ऐबजू
Suhel-Saifur 68:10
11
जो आला दर्जे का चुग़लख़ोर माल का बहुत बख़ील
Suhel-Saifur 68:11
12
हद से बढ़ने वाला गुनेहगार तुन्द मिजाज़
Suhel-Saifur 68:12
13
और उसके अलावा बदज़ात (हरमज़ादा) भी है
Suhel-Saifur 68:13
14
चूँकि माल बहुत से बेटे रखता है
Suhel-Saifur 68:14
15
जब उसके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं तो बोल उठता है कि ये तो अगलों के अफ़साने हैं
Suhel-Saifur 68:15
16
हम अनक़रीब इसकी नाक पर दाग़ लगाएँगे
Suhel-Saifur 68:16
17
जिस तरह हमने एक बाग़ वालों का इम्तेहान लिया था उसी तरह उनका इम्तेहान लिया जब उन्होने क़समें खा खाकर कहा कि सुबह होते हम उसका मेवा ज़रूर तोड़ डालेंगे
Suhel-Saifur 68:17
18
और इन्शाअल्लाह न कहा
Suhel-Saifur 68:18
19
तो ये लोग पड़े सो ही रहे थे कि तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से (रातों रात) एक बला चक्कर लगा गयी
Suhel-Saifur 68:19
20
तो वह (सारा बाग़ जलकर) ऐसा हो गया जैसे बहुत काली रात
Suhel-Saifur 68:20
21
फिर ये लोग नूर के तड़के लगे बाहम गुल मचाने
Suhel-Saifur 68:21
22
कि अगर तुमको फल तोड़ना है तो अपने बाग़ में सवेरे से चलो
Suhel-Saifur 68:22
23
ग़रज़ वह लोग चले और आपस में चुपके चुपके कहते जाते थे
Suhel-Saifur 68:23
24
कि आज यहाँ तुम्हारे पास कोई फ़क़ीर न आने पाए
Suhel-Saifur 68:24
25
तो वह लोग रोक थाम के एहतमाम के साथ फल तोड़ने की ठाने हुए सवेरे ही जा पहुँचे
Suhel-Saifur 68:25
26
फिर जब उसे (जला हुआ सियाह) देखा तो कहने लगे हम लोग भटक गए
Suhel-Saifur 68:26
27
(ये हमारा बाग़ नहीं फिर ये सोचकर बोले) बात ये है कि हम लोग बड़े बदनसीब हैं
Suhel-Saifur 68:27
28
जो उनमें से मुनसिफ़ मिजाज़ था कहने लगा क्यों मैंने तुमसे नहीं कहा था कि तुम लोग (ख़ुदा की) तसबीह क्यों नहीं करते
Suhel-Saifur 68:28
29
वह बोले हमारा परवरदिगार पाक है बेशक हमीं ही कुसूरवार हैं
Suhel-Saifur 68:29
30
फिर लगे एक दूसरे के मुँह दर मुँह मलामत करने
Suhel-Saifur 68:30