Ana SayfaMealler › Suhel-Saifur
SS

Suhel-Saifur

Suhel-Saifur
Suhel-Saifur meali ile okumaya başla
Rahman 1 / 78
1
बड़ा मेहरबान (ख़ुदा)
Suhel-Saifur 55:1
2
उसी ने क़ुरान की तालीम फरमाई
Suhel-Saifur 55:2
3
उसी ने इन्सान को पैदा किया
Suhel-Saifur 55:3
4
उसी ने उनको (अपना मतलब) बयान करना सिखाया
Suhel-Saifur 55:4
5
सूरज और चाँद एक मुक़र्रर हिसाब से चल रहे हैं
Suhel-Saifur 55:5
6
और बूटियाँ बेलें, और दरख्त (उसी को) सजदा करते हैं
Suhel-Saifur 55:6
7
और उसी ने आसमान बुलन्द किया और तराजू (इन्साफ) को क़ायम किया
Suhel-Saifur 55:7
8
ताकि तुम लोग तराज़ू (से तौलने) में हद से तजाउज़ न करो
Suhel-Saifur 55:8
9
और ईन्साफ के साथ ठीक तौलो और तौल कम न करो
Suhel-Saifur 55:9
10
और उसी ने लोगों के नफे क़े लिए ज़मीन बनायी
Suhel-Saifur 55:10
11
कि उसमें मेवे और खजूर के दरख्त हैं जिसके ख़ोशों में ग़िलाफ़ होते हैं
Suhel-Saifur 55:11
12
और अनाज जिसके साथ भुस होता है और ख़ुशबूदार फूल
Suhel-Saifur 55:12
13
तो (ऐ गिरोह जिन व इन्स) तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमतों को न मानोगे
Suhel-Saifur 55:13
14
उसी ने इन्सान को ठीकरे की तरह खन खनाती हुई मिटटी से पैदा किया
Suhel-Saifur 55:14
15
और उसी ने जिन्नात को आग के शोले से पैदा किया
Suhel-Saifur 55:15
16
तो (ऐ गिरोह जिन व इन्स) तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमतों से मुकरोगे
Suhel-Saifur 55:16
17
वही जाड़े गर्मी के दोनों मशरिकों का मालिक है और दोनों मग़रिबों का (भी) मालिक है
Suhel-Saifur 55:17
18
तो (ऐ जिनों) और (आदमियों) तुम अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे
Suhel-Saifur 55:18
19
उसी ने दरिया बहाए जो बाहम मिल जाते हैं
Suhel-Saifur 55:19
20
दो के दरमियान एक हद्दे फ़ासिल (आड़) है जिससे तजाउज़ नहीं कर सकते
Suhel-Saifur 55:20
21
तो (ऐ जिन व इन्स) तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को झुठलाओगे
Suhel-Saifur 55:21
22
इन दोनों दरियाओं से मोती और मूँगे निकलते हैं
Suhel-Saifur 55:22
23
(तो जिन व इन्स) तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमत को न मानोगे
Suhel-Saifur 55:23
24
और जहाज़ जो दरिया में पहाड़ों की तरह ऊँचे खड़े रहते हैं उसी के हैं
Suhel-Saifur 55:24
25
तो (ऐ जिन व इन्स) तुम अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को झुठलाओगे
Suhel-Saifur 55:25
26
जो (मख़लूक) ज़मीन पर है सब फ़ना होने वाली है
Suhel-Saifur 55:26
27
और सिर्फ तुम्हारे परवरदिगार की ज़ात जो अज़मत और करामत वाली है बाक़ी रहेगी
Suhel-Saifur 55:27
28
तो तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे
Suhel-Saifur 55:28
29
और जितने लोग सारे आसमान व ज़मीन में हैं (सब) उसी से माँगते हैं वह हर रोज़ (हर वक्त) मख़लूक के एक न एक काम में है
Suhel-Saifur 55:29
30
तो तुम दोनों अपने सरपरस्त की कौन कौन सी नेअमत से मुकरोगे
Suhel-Saifur 55:30