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M.Farooq-M.Ahmed

M.Farooq-M.Ahmed
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Mürselat 1 / 50
1
साक्षी है वे (हवाएँ) जिनकी चोटी छोड़ दी जाती है
M.Farooq-M.Ahmed 77:1
2
फिर ख़ूब तेज़ हो जाती है,
M.Farooq-M.Ahmed 77:2
3
और (बादलों को) उठाकर फैलाती है,
M.Farooq-M.Ahmed 77:3
4
फिर मामला करती है अलग-अलग,
M.Farooq-M.Ahmed 77:4
5
फिर पेश करती है याददिहानी
M.Farooq-M.Ahmed 77:5
6
इल्ज़ाम उतारने या चेतावनी देने के लिए,
M.Farooq-M.Ahmed 77:6
7
निस्संदेह जिसका वादा तुमसे किया जा रहा है वह निश्चित ही घटित होकर रहेगा
M.Farooq-M.Ahmed 77:7
8
अतः जब तारे विलुप्त (प्रकाशहीन) हो जाएँगे,
M.Farooq-M.Ahmed 77:8
9
और जब आकाश फट जाएगा
M.Farooq-M.Ahmed 77:9
10
और पहाड़ चूर्ण-विचूर्ण होकर बिखर जाएँगे;
M.Farooq-M.Ahmed 77:10
11
और जब रसूलों का हाल यह होगा कि उन का समय नियत कर दिया गया होगा -
M.Farooq-M.Ahmed 77:11
12
किस दिन के लिए वे टाले गए है?
M.Farooq-M.Ahmed 77:12
13
फ़ैसले के दिन के लिए
M.Farooq-M.Ahmed 77:13
14
और तुम्हें क्या मालूम कि वह फ़ैसले का दिन क्या है? -
M.Farooq-M.Ahmed 77:14
15
तबाही है उस दिन झूठलाने-वालों की!
M.Farooq-M.Ahmed 77:15
16
क्या ऐसा नहीं हुआ कि हमने पहलों को विनष्ट किया?
M.Farooq-M.Ahmed 77:16
17
फिर उन्हीं के पीछे बादवालों को भी लगाते रहे?
M.Farooq-M.Ahmed 77:17
18
अपराधियों के साथ हम ऐसा ही करते है
M.Farooq-M.Ahmed 77:18
19
तबाही है उस दिन झुठलानेवालो की!
M.Farooq-M.Ahmed 77:19
20
क्या ऐस नहीं है कि हमने तुम्हे तुच्छ जल से पैदा किया,
M.Farooq-M.Ahmed 77:20
21
फिर हमने उसे एक सुरक्षित टिकने की जगह रखा,
M.Farooq-M.Ahmed 77:21
22
एक ज्ञात और निश्चित अवधि तक?
M.Farooq-M.Ahmed 77:22
23
फिर हमने अन्दाजा ठहराया, तो हम क्या ही अच्छा अन्दाज़ा ठहरानेवाले है
M.Farooq-M.Ahmed 77:23
24
तबाही है उस दिन झूठलानेवालों की!
M.Farooq-M.Ahmed 77:24
25
क्या ऐसा नहीं है कि हमने धरती को समेट रखनेवाली बनाया,
M.Farooq-M.Ahmed 77:25
26
ज़िन्दों को भी और मुर्दों को भी,
M.Farooq-M.Ahmed 77:26
27
और उसमें ऊँचे-ऊँचे पहाड़ जमाए और तुम्हें मीठा पानी पिलाया?
M.Farooq-M.Ahmed 77:27
28
तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की!
M.Farooq-M.Ahmed 77:28
29
चलो उस चीज़ की ओर जिसे तुम झुठलाते रहे हो!
M.Farooq-M.Ahmed 77:29
30
चलो तीन शाखाओंवाली छाया की ओर,
M.Farooq-M.Ahmed 77:30