1
साक्षी है वे (हवाएँ) जिनकी चोटी छोड़ दी जाती है
2
फिर ख़ूब तेज़ हो जाती है,
3
और (बादलों को) उठाकर फैलाती है,
4
फिर मामला करती है अलग-अलग,
5
फिर पेश करती है याददिहानी
6
इल्ज़ाम उतारने या चेतावनी देने के लिए,
7
निस्संदेह जिसका वादा तुमसे किया जा रहा है वह निश्चित ही घटित होकर रहेगा
8
अतः जब तारे विलुप्त (प्रकाशहीन) हो जाएँगे,
10
और पहाड़ चूर्ण-विचूर्ण होकर बिखर जाएँगे;
11
और जब रसूलों का हाल यह होगा कि उन का समय नियत कर दिया गया होगा -
12
किस दिन के लिए वे टाले गए है?
14
और तुम्हें क्या मालूम कि वह फ़ैसले का दिन क्या है? -
15
तबाही है उस दिन झूठलाने-वालों की!
16
क्या ऐसा नहीं हुआ कि हमने पहलों को विनष्ट किया?
17
फिर उन्हीं के पीछे बादवालों को भी लगाते रहे?
18
अपराधियों के साथ हम ऐसा ही करते है
19
तबाही है उस दिन झुठलानेवालो की!
20
क्या ऐस नहीं है कि हमने तुम्हे तुच्छ जल से पैदा किया,
21
फिर हमने उसे एक सुरक्षित टिकने की जगह रखा,
22
एक ज्ञात और निश्चित अवधि तक?
23
फिर हमने अन्दाजा ठहराया, तो हम क्या ही अच्छा अन्दाज़ा ठहरानेवाले है
24
तबाही है उस दिन झूठलानेवालों की!
25
क्या ऐसा नहीं है कि हमने धरती को समेट रखनेवाली बनाया,
26
ज़िन्दों को भी और मुर्दों को भी,
27
और उसमें ऊँचे-ऊँचे पहाड़ जमाए और तुम्हें मीठा पानी पिलाया?
28
तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की!
29
चलो उस चीज़ की ओर जिसे तुम झुठलाते रहे हो!
30
चलो तीन शाखाओंवाली छाया की ओर,
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