3
उसी ने मनुष्य को पैदा किया;
5
सूर्य और चन्द्रमा एक हिसाब के पाबन्द है;
6
और तारे और वृक्ष सजदा करते है;
7
उसने आकाश को ऊँचा किया और संतुलन स्थापित किया -
8
कि तुम भी तुला में सीमा का उल्लंघन न करो
9
न्याय के साथ ठीक-ठीक तौलो और तौल में कमी न करो। -
10
और धरती को उसने सृष्टल प्राणियों के लिए बनाया;
11
उसमें स्वादिष्ट फल है और खजूर के वृक्ष है, जिनके फल आवरणों में लिपटे हुए है,
12
और भुसवाले अनाज भी और सुगंधित बेल-बूटा भी
13
तो तुम दोनों अपने रब की अनुकम्पाओं में से किस-किस को झुठलाओगे?
14
उसने मनुष्य को ठीकरी जैसी खनखनाती हुए मिट्टी से पैदा किया;
15
और जिन्न को उसने आग की लपट से पैदा किया
16
फिर तुम दोनों अपने रब की सामर्थ्यों में से किस-किस को झुठलाओगे?
17
वह दो पूर्व का रब है और दो पश्चिम का रब भी।
18
फिर तुम दोनों अपने रब की महानताओं में से किस-किस को झुठलाओगे?
19
उसने दो समुद्रो को प्रवाहित कर दिया, जो आपस में मिल रहे होते है।
20
उन दोनों के बीच एक परदा बाधक होता है, जिसका वे अतिक्रमण नहीं करते
21
तो तुम दोनों अपने रब के चमत्कारों में से किस-किस को झुठलाओगे?
22
उन (समुद्रों) से मोती और मूँगा निकलता है।
23
अतः तुम दोनों अपने रब के चमत्कारों में से किस-किस को झुठलाओगे?
24
उसी के बस में है समुद्र में पहाड़ो की तरह उठे हुए जहाज़
25
तो तुम दोनों अपने रब की अनुकम्पाओं में से किस-किस को झुठलाओग?
26
प्रत्येक जो भी इस (धरती) पर है, नाशवान है
27
किन्तु तुम्हारे रब का प्रतापवान और उदार स्वरूप शेष रहनेवाला है
28
अतः तुम दोनों अपने रब के चमत्कारों में से किस-किस को झुठलाओगं?
29
आकाशों और धरती में जो भी है उसी से माँगता है। उसकी नित्य नई शान है
30
अतः तुम दोनों अपने रब की अनुकम्पाओं में से किस-किस को झुठलाओगे?
Sonraki 30 ayet →